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Varanasi

ड्रीम प्रोजेक्ट नमामि गंगे के अंतर्गत डॉल्फिन संरक्षण के लिए आह्वान किया

वाराणसी। प्रधानमंत्री  का ड्रीम प्रोजेक्ट नमामि गंगे के अंतर्गत 15 अगस्त सन 2020 को लाल किले से डॉल्फिन संरक्षण के लिए आह्वान किया गया है इसी के संदर्भ में राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन नमामि गंगे भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून जैव विविधता संरक्षण तथा गंगा जीर्णोद्धार परियोजना के अंतर्गत विज्ञान आधारित गंगे डॉल्फिन को 5 अक्टूबर 2009 को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया गया है जिसके संरक्षण एवं जन जागरूकता अभियान को सफल बनाने के लिए पांच राज्य उत्तराखंड ,उत्तर प्रदेश, बिहार,झारखंड, वेस्ट बंगाल के गंगा प्रहरीयों को दो दिवसीय ऑनलाइन जूम मीटिंग एप के माध्यम से विशेष प्रशिक्षित कर मास्टर ट्रेनर बनाया जा रहा है जो गंगा किनारे गंगा ग्रामों में डॉल्फिन संरक्षण तथा जन जागरूकता अभियान में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉक्टर गौरा चंद्र दास डॉ रुचि बडोला द्वारा डॉल्फिन की प्रजाति आवास भोजन प्रजनन की गहन जानकारी दिया गया गौरा चंद्र दास ने कहा कि डॉल्फिन गंगा में बिजनौर से नरोरा बैराज तक कम संख्या में है कानपुर फतेहपुर मैं डॉल्फिन की संख्या अधिक है। संगम प्रयागराज के कुछ क्षेत्रों में डॉल्फिन की संख्या है वाराणसी के ढकवा ग्राम सभा से लेकर बंगाल की खाड़ी तक डॉल्फिन को देखा जा सकता है जिसकी संख्या 2 से 3 हजार तक है। प्रशिक्षित गंगा प्रहरी प्रदेश संयोजक दर्शन निषाद ने प्रशिक्षण उपरांत बताया कि डॉल्फिन की दो उप – प्रजातियां होती हैं पहला प्लाटानिस्ता गंजेटीका गंजेटीका दूसरा प्लाटानिस्ता माइनर जो सिंधु ,गंगा ,ब्रह्मपुत्र ,मेघना, तथा कर्णफूली , संघू नदी मैं यह बांग्लादेश तथा पाकिस्तान में डॉल्फिन की संख्या अधिक है व पाई जाती हैं। डॉल्फिन का आवास केवल मीठे और शुद्ध पानी में ही जीवित रहते हैं। यह शुद्ध पारिस्थितिकी के सूचक भी हैं इनकी भोजन मछलियां है जो गहराई में जाकर के नोकदार लंबी मुंह से भोजन पकड़ते हैं डॉल्फिन की आयु 30 वर्ष होती हैं 10 वर्ष की अवस्था में 10 माह में मार्च से अक्टूबर माह में एक बच्चे को जन्म देती हैं कभी-कभी 2 से 3 साल के बीच में ही डॉल्फिन बच्चे को जन्म देते हैं इनकी गर्भावस्था का समय 10 माह होता है। यह स्तनपाई , मैमल है जो जल में खड़ी हो सकते हैं इको लोकेशन के माध्यम से अपनी दिशा को समझते हैं इनके आंखें नहीं होते हैं लेंस रहित इको लोकेशन माध्यम से पता लगाने में साधन हैं इनके पेट गोल मध्य शरीर गठीला होता है। तैरने के लिए तरणपाद फ्लिपर होता है नर डॉल्फिन 2 से 2.2 मीटर लंबी मादा डॉल्फिन 2.4 से 2.6 मीटर तक लंबे होते हैं सिर के ऊपरी हिस्से स्वसन छिद्र होते हैं और अनोखे नासा पुट और कंठ नली पानी को फेफड़े में जाने से रोकते हैं डॉल्फिन की कलर हल्के भूरे तथा स्लेटी कलर के कभी-कभी गुलाबी कलर की आभा नजर आते हैं इनके दैनिक मौसमी प्रवास के लिए नदी धारा का अविरल होना महत्वपूर्ण है। प्रकृति वास स्थलों के नुकसान, भोजन की कमी अवैध शिकार दुर्घटना वर्ष मछली पकड़ने वाले जाल में फंसना इनके प्रमुख कारण है। भारतीय वन्यजीव अधिनियम 1972 के अधीन गंगा डॉल्फिन पकड़ना कानूनन अपराध है और हम सभी गंगा प्रहरी गांव गांव गंगा ग्रामों में मछुआरों भाइयों को जागरूक करते हैं। अब और जानकारी प्राप्त करने के बाद सम्मानित मछुआरों भाइयों को बोलेंगे कि डॉल्फिन ना पकडे अवैध शिकार ना करें क्योंकि डॉल्फिन शुद्ध वातावरण शुद्ध जल की सूचक है राष्ट्रीय जलीय जीव है।

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