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दिवाली 2020 : वृष लग्न में करें पूजा, बन रहा धनवर्षा का योग

इस साल पूजन के तीन मुहूर्त धनवर्षा का योग लेकर आया है। आचार्य एसएस  नागपाल ने बताया कि 14 को दीपावली पर पूजन के तीन मुहूर्त हैं। व्यापारिक प्रतिष्ठानों, घर और निशा पूजन के लिए अलग-अलग मुहूर्त हैं। सबसे शुभ मुहूर्त स्थिर वृष लग्न में शाम 5:16 बजे से 7:13 बजे के बीच है जिसमे पूजन से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। आचार्य शक्तिधर त्रिपाठी ने बताया कि  स्नान दान की अमावस्या 15 नवंबर को होगी। महालक्ष्मी का विधि विधान पूर्वक पूजन करें।

पूजन के तीन मुहूर्त  
– पहला मुहूर्त- दोपहर 12:37 से 2:09 बजे तक स्थिर कुंभ लग्न
–  दूसरा मुहूर्त- शाम 5:16 से 7:13 बजे तक स्थिर वृष लग्न
–  तीसरा मुहूर्त- देर रात 11:44 से 1:58 बजे तक स्थिर सिंह लग्न

दीपावली की पूजा विधि

-पूजा वाली चौकी पर साफ कपड़ा बिछाकर मां लक्ष्मी, सरस्वती व गणेश जी की प्रतिमा को विराजमान करें।

-मूर्तियों का मुख पूर्व या पश्चिम की तरफ होना चाहिए। हाथ में थोड़ा गंगाजल लेकर उनकी प्रतिमा पर इस मंत्र का जाप करते हुए छिड़कें.

ऊँ अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स: वाह्याभंतर: शुचि:।।

-दिवाली के दिन भगवान गणेश और माता लक्ष्मी जी और कुबेर जी की पूजा की जाती है।

-इस दिन घर के सभी लोग शाम के समय स्नान करने के बाद साफ वस्त्र धारण करें।

-इसके बाद एक चौकी पर गंगाजल छिड़कर उस पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं।

-कपड़ा बिछाने के बाद खील और बताशों की ढेरी लगाकर उस पर भगवान गणेश, माता लक्ष्मी की प्रतिमा और कुबेर जी की प्रतिमा स्थापित करें।

-इसके बाद कुबेर जी प्रतिमा भी स्थापित करें और साथ ही कलश की स्थापना भी करें। उस पर स्वास्तिक बनाकर आम के पत्ते रखें और नारियल स्थापित करें।

-कलश स्थापित करने के बाद पंच मेवा, गुड़ फूल, मिठाई, घी, कमल का फूल,खील और बताशे भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के आगे रखें।

-इसके बाद अपने घर के पैसों, गहनों और बहीखातों आदि को भगवान गणेश और माता लक्ष्मी के आगे रखें।

-यह सभी चीजें रखने के बाद घी और तेल के दीपक जलाएं। विधिवत भगवान गणेश और माता लक्ष्मी जी की पूजा करें।

-माता लक्ष्मी के मंत्रों का जाप और साथ ही श्री सूक्त का भी पाठ करें।

-पूजा समाप्त होने के बाद अंत में अपने घर के मुख्य द्वार पर तेल के दो दीपक अवश्य जलाएं और साथ ही अपनी तिजोरी पर भी एक दीया अवश्य रखें।

-जल अपने आसन और अपने आप पर भी छिड़कें।

-इसके बाद मां पृथ्वी माता को प्रणाम करें और आसन पर बैठकर हाथ में गंगाजल लेकर पूजा करने का संकल्प लें।

एक जल से भरा कलश लें जिसे लक्ष्मी जी के पास चावलों के ऊ पर रखें। कलश पर मौली बांधकर ऊ पर आम का पत्ते रखें। साथ ही उसमें सुपारी, दूर्वा, अक्षत, सिक्का डालें।

-कलश पर एक नारियल रखें। नारियल लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि उसका अग्रभाग दिखाई देता रहे। यह कलश वरुण का प्रतीक है।

-सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें। फिर लक्ष्मी जी की अराधना करें। इसी के साथ देवी सरस्वती, भगवान विष्णु, मां काली और कुबेर की भी विधि विधान से पूजा करें।

-पूजा करते समय 11 या 21 छोटे सरसों के तेल के दीपक और एक बड़ा दीपक जलाना चाहिए। एक दीपक चौकी के दाईं ओर एक बाईं ओर रखना चाहिए.

-भगवान के बाईं तरफ घी का दीपक जलाएं। उन्हें फूल, अक्षत, जल और मिठाई अर्पित करें.

-अंत में गणेश जी और माता लक्ष्मी की आरती उतार कर भोग लगाकर पूजा संपन्न करें।

-जलाए गए 11 या 21 दीपकों को घर के सभी दरवाजों के कोनों में रख दें।

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