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खजाना बटोरने आज उमड़ी काशी
Go Back | Ashok Shrivastava , Oct 17, 2017 04:35 PM
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काशी पुराधीश्वरी मां अन्नपूर्णा अपने पुरवासियों के लिए साल में चार दिन खजाना बांटती हैं। धनतेरस से अन्नकूट के बीच मां की स्वर्णमयी प्रतिमा के दर्शन और खजाना प्राप्त करने के लिए पूरी काशी जुटती है। इन चार दिनों के दौरान सुप्रसिद्ध अन्नपूर्णा मंदिर में तिल रखने की जगह नहीं होती मगर श्रद्धालुओं का रेला अनुशासित हो दर्शन करता है। 

स्वर्णमयी अन्नपूर्णा के दर्शन और उनका खजाना प्राप्त करने की तीव्र इच्छा लोगों को अपने घरों से सैकड़ों हजारों किलोमीटर दूर काशी ले आती है। मान्यता है कि मां का खजाना घर को धन-धान्य से पूर्ण रखता है, किसी वस्तु की कमी नहीं होने पाती। मां का खजाना प्राप्त करने के लिए उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों से तो लोग आते ही हैं, सर्वाधिक भीड़ दक्षिण भारत के दर्शनार्थियों की होती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि माता अन्नपूर्णा का खजाना पाने की हसरत पूरे देश को काशी में जुटा लेती है।   

काशी विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र में स्थित मां अन्नपूर्णा का दरबार धनतेरस की पूर्व संध्या (16 अक्तूबर) पर आधी रात के बाद दर्शन के लिए खोल दिया जाएगा। पूरे साल में धनतेरस से लेकर अन्नकूट तक चार दिन अन्नपूर्णा के स्वर्णमयी विग्रह का दर्शन सभी को सुलभ होता है। काशी का अन्नपूर्णा मंदिर देश का एकमात्र मंदिर है जहां धनतेरस से अन्नकूट तक खजाने का वितरण होता है। खजाना के रूप में मिले सिक्के व धान के लावा को लोग तिजोरी व पूजा स्थल पर रखते हैं। मान्यता है कि मां का प्रसाद तिजोरी और पूजा स्थल पर रखने से पूरे वर्ष धन और अन्न की कमी नहीं होती। 

अन्नपूर्णा की पुरी है काशी 
भगवान शंकर से विवाह के उपरांत पार्वती ने काशीपुरी में निवास की इच्छा व्यक्त की। महादेव उन्हें साथ लेकर अविमुक्त-क्षेत्र (काशी) आ गए। तब काशी श्मशान नगरी थी। माता पार्वती को सामान्य गृहस्थ स्त्री के समान अपने घर का श्मशान में होना नहीं भाया। तब व्यवस्था दी गई कि सतयुग, त्रेता व द्वापर में काशी श्मशान रहेगी किंतु कलिकाल में अन्नपूर्णा की पुरी के रूप में बसेगी। इसी कारण अन्नपूर्णा मंदिर को काशी के  प्रधान देवीपीठ की मान्यता है। 

योगक्षेम की करती हैं चिंता
स्कन्दपुराण के काशीखण्ड में उल्लेख है कि भगवान विश्वेश्वर गृहस्थ हैं और भवानी उनकी गृहस्थी चलाती हैं। अत: काशीवासियों के भी योग-क्षेम का भार इन्हीं पर है। ब्रह्मवैवर्त्तपुराण के काशी-रहस्य के अनुसार भवानी ही अन्नपूर्णा हैं। सामान्य दिनों में अन्नपूर्णा माता की आठ परिक्रमा की जाती है। प्रत्येक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन अन्नपूर्णा देवी के निमित्त व्रत रह कर उनकी उपासना का विधान है। नित्य पूजन-उपासना का भी काफी महत्व बताया गया है।

ऐसा है देवी का स्वरूप
देवी पुराण के अनुसार मां अन्नपूर्णा का रंग जवापुष्प के समान है। भगवती अन्नपूर्णा अनुपम लावण्य से युक्त नवयुवती के सदृश हैं। बंधूक के फूलों के मध्य दिव्य आभूषणों से विभूषित देवी प्रसन्न मुद्रा में स्वर्ण-सिंहासन पर विराजमान हैं। बाएं हाथ में अन्न से पूर्ण माणिक्य, रत्न से जड़ा पात्र तथा दाहिने हाथ में रत्नों से निर्मित कलछुल है। 

 
(Ashok Shrivastava)  
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