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चार दिवसीय डाला छठ पर्व की तैयारी शुरू
Go Back | Ashok Shrivastava , Oct 22, 2017 06:19 PM
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News Image Varanasi / Banaras : 

संतान के दीर्घायु की कामना करने वाली माताओं का सबसे बड़ा पर्व चार दिवसीय डाला छठ 24 अक्तूबर से शुरू हो रहा है। कई दिनों पहले से ही गंगा घाटों, तालाबों व कुंडों की साफ सफाई में स्वयंसेवी संस्थाएं व क्षेत्रीयजन युद्ध स्तर पर लगे हुए हैं। व्रती महिलाएं भी अपने घरों की साफ सफाई करने के साथ ही पूजा पाठ की सामग्री जुटाने में लगी हुई है। बाजारों में दिवाली के बाद एकबार फिर से डाला छठ में भीड़ भाड़ दिखाई देनी शुरू हो गई है।

कार्तिक शुक्ल पक्षीय तिथि पर चार दिवसीय डाला छठ जिले में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। व्रती महिलाओं की भीड़ सबसे ज्यादा बलुआ गंगा घाट, पड़ाव भगवान अवधूत राम घाट, दामोदरदास पोखरा, मानसरोवर तालाब, चकिया काली मंदिर, चंदौली सावजी पोखरा आदि जगहों पर जुटती है। स्वयसेवी संस्था व आसपास के नागरिकों ने तालाबों व घाटों की साफ सफाई युद्ध स्तर पर करने में लगे हैं। पंडित त्रिपुरारी मिश्रा ने बताया कि 24 अक्तूबर को पहला दिन व्रती महिलाएं घरों को साफ सुथरा व स्नान कर लौकी की सब्जी, चना का दाल व चावल बना ग्रहण करने के साथ ही व्रत उठाती है। व्रती महिलाएं जब तक भोजन नहीं कर लेती है। तब तक घर का कोई भी सदस्य अन्न नहीं ग्रहण करता है। व्रती महिलाओं के भोजन के उपरांत ही परिवार के सदस्य प्रसाद के रूप में इसको ग्रहण करते हैं।

डाला छठ की पौराणिक मान्यता

डाला छठ मनाने की कई कथा प्रचलित हैं। भगवान कृष्ण का पुत्र शांभ था। वह काफी सुंदर व गुणवान था। यौवन के उन्माद में एक बार स्त्रियों के साथ निवस्त्र होकर जलक्रीड़ा कर रहा था। भगवान कृष्ण ने जब देखा, तो क्रोध में आकर उसे चर्म रोग का श्राप दे दिया। शांभ ने क्षमा याचना की, तो श्रीकृष्ण भारत देश से दूर शाकदीप गए। वहां से आयुर्वेद के ज्ञाता और सूर्य के उपासक 72 ब्राह्मणों को साथ लेकर वापस आए। सभी ब्राह्मण शांभ को प्रतिदिन कमर भर पानी में खड़ा कराकर उगते व डूबते सूर्य को अर्घ्य दिलाया। शांभ धीरे धीरे ठीक होने लगा। तभी से यह पर्व के रूप में मनाया जाने लगा।

पर्व में योग व प्राकृतिक चिकित्सा

चार दिवसीय पर्व को मनाने में व्रती महिलाओं का योग व प्राकृतिक चिकित्सा अपने आप ही हो जाता है। योग के आधार पर देखा जाए, तो डाला छठ में सूर्य नमस्कार व उपवास आते हैं। जबकि प्राकृतिक चिकित्सा में कटि स्नान से शरीर का हर अंग शुद्ध हो जाता है। छठ का पूजा ऐसा है, जिसमें पृथ्वी, आकाश, जल, वायु व सूर्य का आराधना एक साथ होती है। कटि स्नान के दौरान व्रती पानी में घंटों सूर्य के अस्त व उदय होने के इंतजार में खड़ी रहती है। इस दौरान शरीर का आधा हिस्सा पानी के अंदर व शेष बाहर रहता है। इससे पूरे शरीर का रक्त संचार होने लगता है। अर्घ्य देते समय सूर्य की असीम ऊर्जा शरीर में प्रवेश करती है। पूजा में नंगे पांव घाट व कुंडों तक की जाने की प्रथा है। इससे पैर के तलवे में एक्यूप्रेशर प्वांइट में चुबन होता है। इससे पेट, आंख, मुंह, नाक जैसे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में रक्त का संचार होता है।

माला-फूल व फल की सजी दुकानें

डाला छठ को देखते हुए बाजार में माला-फूल के साथ ही फलों की दुकानें सज गई। डाला छठ पर सूप व दौरी की महत्ता भी काफी है। पूरे दिन खरीदारों की भीड़ उमड़ रही है। दुकानदार लक्ष्मीना देवी ने बताया कि डाला छठ पर सूप व दौरी की महत्ता होता है। पिछली बार जहां सूप 40 से 50 रुपये और दौरी 120 रुपये प्रति पीस बिका। इस बार कीमतों में 10 से 20 रुपये की बढ़ोतरी हुई है।


 
(Ashok Shrivastava)  
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