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Varanasi

नवरात्र के चौथे दिन देवी कूष्‍मांडा का पूजन

वाराणसी। काशी में अलग – अलग नवदुर्गा के नौ मंदिर स्‍थापित हैं। शारदीय नवरात्र की चतुर्थी तिथि पर देवी कूष्मांडा स्वरूप के दर्शन पूजन करने की मान्यता है। इस बार 20 अक्टूबर मंगलवार को इनकी आराधना की जा रही है। काशी में दुर्गाकुंड स्थित मां दुर्गा को ही देवी कूष्मांडा के स्वरूप की मान्यता दी गई है। मंगलवार की दोपहर तक हजारों लोगों ने पर्याप्‍त दूरी के साथ मंदिर में दर्शन पूजन किया है। जबकि शाम को मंदिर के कपाट दोबारा खुलने पर आस्‍था की कतार दोबारा लग जाएगी।

शास्त्रों में मान्यता यह भी है कि अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड तक का सृजन देवी ने इसी स्वरूप में ही किया था। देवी के कुष्मांडा स्वरूप के दर्शन और पूजन से दुख का नाश होता है। काशी में देवी कुष्‍मांडा के प्रकट होने की कथा राजा सुबाहु से जुड़ी मानी जाती है। ख्‍यात ज्‍योतिषाचार्य पं. ऋषि द्विवेदी के अनुसार कूष्मांडा देवी आराधना के पर्व शारदीय नवरात्र के चौथे दिन चतुर्थ स्वरूप कूष्मांडा के दर्शन पूजन का विधान है। मान्यता है कि देवी ने ही ब्रह्मांड की रचना की थी। सृष्टि की उत्पत्ति करने के कारण इन्हें आदिशक्ति भी कहा जाता है।

पूजन की विधि : जगदंबा के इस स्वरूप के पूजन में – ‘अर्ध मात्रा स्थित नित्या यानुचार्या विशेषत, त्‍वमेव संध्‍या सावित्री त्वं देवि जननी परा’ मंत्र की विशेष महत्ता मानी गई है।

उत्‍पत्ति की वजह : असुरों के अत्याचार से देव ऋषि यों को मुक्ति दिलाने के लिए देवी दुर्गा कुष्मांडा स्वरूप में अवतरित हुई थी मान्यता है कि पुष्प धूप दीप आदि श्री सूक्त का पाठ करते हुए आराधना करने से प्रसन्न होकर सभी पापों से मुक्ति दिलाती हैं।

आज का संदेश: देवी का स्वरूप सकारात्मकता बनाए रखने का संदेश देता है।

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